रोगों को दूर भगाइए - खुलकर हसियें एवं ओरो को भी हसाइएँ
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रोगों को दूर भगाइए - खुलकर हसियें एवं ओरो को भी हसाइएँ
(Kiran Kathuria) www.bharatdarshannews.com Wednesday,01 May , 2019)

New Delhi News, 01 May 2019 : एक व्यक्ति जब क्रोध करता है, तो वह चाहे कितना ही सुंदर क्यों न हो, कुरूप दिखाई पड़ता है। वहीं जब एक व्यक्ति मुस्कुराता है, तो वह चाहे कितना ही बदसूरत क्यों न हो सुंदर दिखाई देने लगता है। किसी विचारक ने ठीक ही कहा है कि धरती पर जो प्रभाव सूर्य की सुनहरी किरणों का पड़ता है, वही एक इन्सान के चेहरे पर मुस्कान का होता है। सूर्य-रश्मियों से जैसे धरती लहलहा उठती है, वैसे ही एक प्यारी-सी मुस्कान से चेहरा खिल उठता है। इसलिए ही तो मुस्कान को 'मुख का इन्द्रधनुष' भी कहा गया। पर यह विडम्बना है कि आज के भागम-भाग के दौर में हम मुस्कुराना ही भूल गए हैं। और जहाँ तक हंसने का प्रश्न है, तो बहुत से लोगों को तो यह तक याद नहीं होगा कि वे आखिरी बार कब खिलखिला कर हँसे थे। हँसी की यही गैरहाजिरी आज हमारे जीवन में तनाव व डिप्रेशन का कारण है। हँसी प्रेशर-कूकर के सेफ्टीवाल्व की तरह है। ठीक जैसे वाल्व कूकर में बनी फालतू गैस को निकालकर उसे फटने से बचाता है, उसी प्रकार हँसी का एक फव्वारा हमारे भीतर बढ़ते तनाव को एक झटके में उड़ा सकता है। इसलिए हँसिए, खूब हँसिए। पर जरा ध्यान रखें-

हँसी में जिन्दादिली हो, बनावट नहीं- बनावटी एवं खिसियानी हँसी किसी काम की नहीं होती। विशेषज्ञों के अनुसार इससे कोई लाभ नहीं होता। वास्तविक हँसी तो वह है जिसमें कोई फॉर्मेलिटी (औपचारिकता) नहीं, भरपूर जिन्दादिली हो। जो ऊपरी नहीं, मन की गहराइयों से उपजी हो। हँसना है तो खूब खुलकर, जमकर हँसें। हँसी के फव्वारों को ह्रदय की जमीन से फूटने दें। ऐसे हँसे कि शरीर का एक-एक अंग, एक-एक पोर रोमांचित हो उठे। हँसी की तरंगें दिल में हिलोरें लेने लगें। आपकी ऐसी अट्टहास हँसी ही रोजमर्रा के भारीपन को बुहारकर आपको हल्केपन का एहसास करा सकती है। आप ही नहीं, आपके संपर्क में आने वाले लोगों के बुझे-बुझे और पीले चेहरों पर भी रौनक लौटा सकती है।

हँसी में उल्लास हो, व्यंग नहीं- हंसें तो खुलकर, पर जरा ध्यान रखें कि आपकी हँसी में छिछोरापन न हो। किल्फ थॉमस के अनुसार- जब किसी की कमजोरी हमारे हँसने का कारण बने, जब किसी चीज को मजेदार बनने के लिए बेअदबी की जरूरत पड़े, जब कोई दिल में दुःख लेकर जाये, जब हमारी हँसी किसी को रुला दे या जब हर कोई उसमें शामिल न हो सके, तब यकीन मानिये वह हँसी, हँसी नहीं एक घटिया जोक (Joke) होती है। इसलिए सदा एहतियात बरतें कि आप जब भी हँसें माहौल और दिलों को खुशनुमा बनने के लिए हँसें। किसी पर व्यंग्य कसने या छींटाकशी करने के लिए नहीं।

खुद के बनाए बदनसीब बनें- तीन और तीन छह भी बन सकते हैं और शून्य भी। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप अपने जीवन में कौन सा सूत्र लगाते हैं, प्लस (+) का या माइनस (-) का। जो 'प्लस' का यानी खुशमिजाजी का सूत्र लगाते हैं और हर बात का अच्छा, उज्ज्वल व आनन्ददायी पहलू ही देखते हैं, वह सदा फलते-फूलते हैं। इसके विपरीत जिनका नजरिया जिन्दगी के प्रति 'नेगेटिव' यानि निराशाजनक होता है, उन्हें तो सफलता की झलक भी नसीब नहीं होती। वे सदा खाली के खाली ही रह जाते हैं। पास यदि कुछ होता है तो वह है रोना-धोना और ढेरों गिले-शिकवे।

हर हाल में खुश रहें- कुछ ऐसे जिंदादिल लोग भी होते हैं, जो अपनी बदनसीबी पर भी मुस्कुराने का दम रखते हैं। इनका एटिच्यूड जिंदगी के प्रति इतना पॉजिटिव होता है कि ये विषम-से-विषम परिस्थितियों में भी प्रसन्न रहने का करण ढूँढ़ ही निकालते हैं। तभी तो Hugh Downs ने कहा है- 'प्रसन्नचित्तता इस बात पर निर्भर नहीं करती है कि आपकी परिस्थितियां कैसी हैं, बल्कि इस बात पर करती है कि आपका इन परिस्थितियों के प्रति नजरिया कैसा है।' सकारात्मक नजरिया रखने वाले तो हंसकर कठिनाईयों को भी अपना मित्र बना लेते हैं।

इसलिए आइये हम भी अपने जीवन के प्रति आशा-उत्साह से भरा रुख अपनाएं। वायदा करें अपने आप से कि हम सुख में, दुःख में, हर हाल में प्रसन्न रहेंगें, जिन्दादिल रहेंगे। पर ऐसी सकारात्मक सोच, इतनी जिन्दादिली यथार्थ में कब आ पाती है? इसके लिए जरूरी है-

सज्जन बनें, सदगुणों का विकास करें- यदि आज हम दुःखी हैं, हंस नहीं पाते तो उसका एक मुख्य करण है- हमारे दुर्गुण। मान लीजिये, आप चार व्यक्तियों के साथ बैठे हैं। इनमें से एक के प्रति आपके मान में क्रोध है, दुसरे के प्रति ईर्ष्या-द्वेष है, तीसरे से कोई गिला-शिकवा है और चौथे के प्रति कोई ग़लतफ़हमी है। आप ईमानदारी से बताइए कि क्या आप इन लोगों के साथ बैठकर प्रसन्नचित रह पाएँगे? कभी आपके भीतर ईर्ष्या ज़ोर मारेगी, तो कभी क्रोध उठेगा.... आपका चित्त तो मनोविकारों से ही भरा रहेगा, प्रसन्नता का तो सवाल ही नहीं उठता इसलिए प्रसन्न रहने के लिए सबसे पहली शर्त है कि आप अपने मन के इन विकारों को दूर करें। उनके स्थान पर सदगुणों का विकास करें। सहनशील प्रवृत्ति अपनाएँ। दूसरों की भावनाओं की कदर करना सीखें। उनकी दुर्बलताओं के प्रति उदार रहें। और सबसे महत्त्वपूर्ण बात, अपनी दृष्टि दूसरों के अवगुणों पर नहीं, उनके गुणों पर टिकाएँ। स्वभाव की ये छोटी-छोटी विशेषताएँ ही प्रसन्नता की घटक हैं। यह दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की मासिक पत्रिका अखंड ज्ञान से उदग्रित लेख है!

अंग्रेजी में एक कहावत है-'Laughter is the Best Medicine.' अर्थात् हँसी सर्वश्रेष्ठ दवा है। कैसे? आइये यह जाने-

  1. हँसी एक भीतरी जॉगिंग- प्रतिदिन चार-पाँच किलोमीटर दौड़ने से जितना व्यायाम होता है, उतना व्यायाम कुछ देर खिलखिलाकर हँसने से हो जाता है। हँसने से भीतरी अंगों की अच्छी-खासी कसरत हो जाती है।
  2. रोगों को दूर भगाइए- खुलकर हँसने से ब्रांकाइटिस, दम, मानसिक तनाव, हीनभावना, अनिद्रा, डिप्रेशन, रक्तचाप तथा ह्रदय रोग जैसी दुष्कर बीमारियों भी सहज में ही ठीक हो जाती हैं।
  3. पचपन में भी बचपन जैसे दिखें- जब हम ठहाका लगा कर हँसते हैं तो एंडोर्फिनन नामक हार्मोन निकलता है, जो शरीर में सक्रियता एवं स्फूर्ति को जगाता है। साथ ही हँसने से चेहरे की मासपेशियों की अच्छी मसाज हो जाती है जिस कारण झुर्रियाँ नहीं पड़ती।
  4. ह्रदय, फेफड़ों का मुफ्त ईलाज- जब हम गहरी साँस लेकर ठहाका लगाकर हँसते हैं, तो शरीर में रक्त-संचार तीव्र हो जाता है, फेफड़ो में भरी दूषित वायु बाहर निकल जाती है और ऑक्सीजन का प्रवाह तेज हो जाता है।
  5. हँसिए और उम्र बढ़ाइए- लम्बी आयु का एक राज प्रसन्न रहना भी है। तभी शेक्सपीयर ने कहा- प्रसन्नचित्त दीर्घजीवी होता है।

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