क्यों हर साल 25 दिसंबर कोमनाया जाता है क्रिसमस का त्यौहार?
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क्यों हर साल 25 दिसंबर कोमनाया जाता है क्रिसमस का त्यौहार?
(Kiran Kathuria) www.bharatdarshannews.com Tuesday,24 December , 2019)

New Delhi News, 24 December 2019 (bharatdarshannews.com) : Jingle bell, Jingle bell, Jingle all the way- की मधुर ध्वनि हवाओं में गूँजती सुनाई दे रही है। काँधे पर उपहारों से भरी पोटली लिए, लाल रंग व फर वाली पोशाक पहने कोई झूमता हुआ घरों की ओर बढ़ रहा है। आप पहचान ही गए होंगे- ये हैं बच्चों के प्यारे संता क्लौस! बाज़ार सजने लगे हैं। छोटी-छोटी घंटियों व जगमग सितारों से लदे क्रिसमस पेड़, रंग-बिरंगी आकर्षक मोमबत्तियां व ढेर सारे छोटे-बड़े तोहफों से भरी हुई दुकानें- ये सभी नज़ारे स्पष्ट कह रहे हैं कि खुशियों से भरा त्यौहार क्रिसमस हमारे बीच आने ही वाला है। क्रिसमस यानी की बड़ा दिन, यह प्रत्येक वर्ष 25 दिसम्बर को सम्पूर्ण विश्व में प्रभु यीशु के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह सबसे पहले चौथी शताब्दी के प्रारंभ में रोम में मनाया गया था। इस पर्व के अवसर पर गिरजाघरों में बालक ईसा की मूर्ति को चरनी में रखा जाता है। यह परम्परा याद दिलाती है कि दीन-हीनों के मसीहा ईसा का जन्म एक अस्तबल में हुआ था। वहाँ उचित स्थान न होने के कारण उनकी माँ मरियम को उन्हें एक चरनी में लिटाना पड़ा था। इतना ही नहीं, ईसाई देशों में इस दिन अनेकों और रिवाज भी प्रचलित हैं। जैसे-क्रिसमस पेड़ सजाना, कैरोल या क्रिसमस गीत गाना, एक दूसरे को उपहार देना व शुभकामनाएं भेजना आदि। इन रीतियों में भी प्रभु यीशु के जन्म से जुड़ी अनेकों घटनाओं की झलक मिलती है।  अब क्रिसमस पेड़ को सजाने की परम्परा को ही लें। इस दिन हर घर में प्रभु यीशु के सम्मान में सदाबहार पेड़ को चमचम सितारों, घंटियों, खिलौनों व रंग-बिरंगी लेस से सजाया जाता है। क्रिसमस का यह सदाबहार पेड़ ईसा की सनातन शिक्षाओं व सिद्धांतों का प्रतीक है। इस पेड़ के शीश पर चमकता हुआ एक बड़ा सितारा सजाया जाता है। यह सितारा प्रतीक है उस दिव्य तारे का जो प्रभु यीशु के जन्म के एकदम बाद पूर्वी आकाश में चमका था। कहा जाता है कि इसी सितारे से तीन ज्योतिषियों ने यीशु के जन्म का शुभ संकेत पाया था और फिर वे उनकी स्तुति करने के लिए अस्तबल तक पहुँचे थे। वहाँ पहुंचकर उन्होंने बालक यीशु की आराधना की थी। साष्टांग प्रणाम करके उनके चरणों में सोना, लोबान और गंध रस आदि उपहार भेंट किए थे।  इसी कारण क्रिसमस के पावन पर्व पर एकदूसरे को उपहार देने का प्रचलन है। उपहार देने की इस प्रथा के साथ एक और कथा जुड़ी है, संत निकोलस की। संत निकोलस चर्तुथ शताब्दी ई॰ में एशिया माइनर के मीरा नामक नगर के एक पादरी थे। हॉलैंड वासी इन्हें ही 'संत निकोलस' कहा करते थे। यही आगे चलकर 'सिंतर क्लास' और फिर 'सांता क्लॉस'कहे जाने लगे। ये यूरोप के अत्यंत लोकप्रिय और बड़े परोपकारी संत थे। कहा जाता है कि ये बच्चों, मल्लाहों व जरूरत मंदों को उपहार दिया करते थे। अमरीका, इंग्लैंड व अन्य ईसाई देशों में संता क्लौस के इसी परोपकार को क्रिसमस पर्व के साथ जोड़ा गया है। वहाँ यह मान्यता है कि संता क्लौस आज भी हर क्रिसमस पर्व पर बच्चों को उपहार देने आते हैं।  इतना ही नहीं, इस दिन मोमबत्तियों व लाइटिंग से जगमगाते गिरजाघरों में विशेष रूप से क्रिसमस गीत व कैरोल गाने का भी प्रचलन है। इस प्रथा के मूल में भी यीशु के जन्म से जुड़ी एक घटना ही है। कहा जाता है यीशु के समय कुछ चरवाहे पास ही अपने झुंड की रखवाली कर रहे थे। तभी अचानक एक प्रभु दूत उनके सामने प्रगट होता है और उन्हें उद्धारकर्ता प्रभु यीशु के जन्म की शुभ सूचना देता है। फिर एकाएक स्वर्ग दूतों का एक पूरा दल वहाँ प्रकट होता है और ये सभी मिलकर परमेश्वर की स्तुति व वंदना करते हैं- 'Glory to God in the highest and on earth peace to men on whom his favour rests.'ईसाई इसे ही सबसे पहला क्रिसमस गीत मानते हैं। इसी दैवी घटना को याद करते हुए प्रत्येक वर्ष यीशु के जन्मोत्सव पर परमेश्वर की महिमा में क्रिसमस गीत गाए जाते हैं।  क्रिसमस पर्व हमारे जीवन को एक महान दिशा निर्देशन कासामर्थ्य रखता है। परन्तु यदि हम इसको केवल बाहरी परम्पराओं तक ही सीमित रखते हैं तो इससे पूरी तरह लाभ नहीं उठा पाएंगे। जीसस तो हम सभी के भीतर सदा से शब्द (Word), आदि नाम के रूप में समाए हुए हैं। तभी उनके जन्म के संबंध में कहा गया- 'The word became flesh' अर्थात् वो शब्द ही इस संसार में देह धरकर आया है। भीतर इस शब्द (आदि नाम) के प्रकट होने पर ही सच्चे अर्थों में क्रिसमस पर्व मनाया जा सकता है। फिर हम बाहरी रूप से क्रिसमस मनाने के साथ-साथ आध्यात्मिक रूप से भी अपने भीतर मना सकते हैं। बाहरी कैरोल व मोमबत्तियों के साथ-साथ अपने भीतर दिव्य प्रकाश (Divine Light) व दिव्य संगीत (Holy Music) का भी आनंद उठा सकते हैं। ये दिव्य अनुभव बहुत दुर्लभ हैं, जिन्हें बड़े-बड़े तपस्वी और हठी घोर तप के द्वारा भी प्राप्त नहीं कर पाते।लेकिन ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों के पास पहुँचकर इन्हें सहज ही प्राप्त किया जा सकता है। प्रभु यीशु ने स्वयं अपने शिष्यों को ये दिव्य और आंतरिक अनुभव प्रदान किए थे। तभी उनका कहना था- 'मैं तुमसे सच कहता हूँ, बहुत नबियों और धर्मियों ने चाहा कि जो बातें तुम देखते हो, देखें, पर वे न देख सके; और जो बातें तुम सुनते हो, उनको सुने, पर वे न सुन सके। (मत्ती 13:17)' इसलिए क्रिसमस पर्व की सार्थकता तभी है जब हम भी अपने भीतर वो देखें व सुनें जिसे जीसस जैसे महापुरुष ब्रह्मज्ञान प्रदान कर दिखाते व सुनाते हैं।

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