लोकतंत्रिक व्यवस्था में राजनेताओं को कामवासना से बचना होगा
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लोकतंत्रिक व्यवस्था में राजनेताओं को कामवासना से बचना होगा
(Kiran Kathuria) www.bharatdarshannews.com Saturday,28 September , 2019)

JB Sharma/Faridabad News, 28 September 2019 :  इस संक्षिप्त से लेख को पूरा करने से पहले हम सर्वपल्ली डॉ. राधा कृष्णन द्वारा रचित ग्रंथ भारतीय दर्शन भाग-1 के पांचवे अध्याय-भौतिकवाद का सहारा ले रहे हैं। जिसमें लिखा है कि अलग-अलग समय के राजनैतिक संकटों ने मनुष्य के मन को अक्सर अस्थिर रखा है। जहां अपने देश भारत की बात है तो इसका इतिहास तो बताता है कि छोटी-छोटी रियासतें जो उस काल में मौजूद थी। उनके बीच अमूमन किसी न किसी कारण से आपसी अनबन बनी रहती थी। वही विदेशी आक्रमणकारियों ने देश के अमनों-चैन को भंग कर रखा था। इतिहासकारों की बात करें या फिर और डॉ. राधा कृष्णन के  उपरोक्त ग्रंथ का उल्लेख करें तो हमें मिलता है कि, उस दौर में राजाओं के अध:पतन का कारण उनकी कामवसना और जनसाधारण में बढ़ती धन-लोलुपता की शिकायतें सुनी जाती थी। ऐसे में सवाल यह है कि युगांतर के बाद आज की  लोकतांत्रिक शासनीय प्रणनाली के आधुनिक युग में क्या मान लिया जाए कि आम आदमी की रहनुमाई करने वाले कथाकथित कहें तथाकथित वर्तमान राजाओं और जनता में उपरोक्त मानवीय अवगुण नहीं हैं? तो आप पाठकों का उत्तर नमालूम क्या होगा परन्तु हमारा जवाब है कि मानवीय वृतियां हर युग कमोबेश एक सी ही रही हैं।आईए अब बात करते हम भारतीयों के लिए उन दो महाकाव्य के बारे में जिन्हें हम रामायण और महाभारत के नामों से जानते हैं। इनके बारे में सबसे पहला सवाल यह है कि ये ग्रंथ कितने प्राचीन माने जा सकते हैं? हमारे उक्त प्रश्र के उत्तर के बारे डॉ. राधा कृष्णन उक्त ग्रंथ में उल्लेख में मिलता है कि रामायण और महाभारत महाकाव्यों में जिन घटनाओं का जि़क्र  मिलता है वे अधिकतर वैदिकाल की हैं। वहीं इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि प्राचीन आर्य बड़ी तदाद में गंगा के तराई वाले क्षेत्रों में आकार बसे थे। मिसाल के  तौर पर दिल्ली के आसपास, पांचाल लोग कन्नौज़ की समीप, कौशल लोग अवध के पास और काशी लोग बनारस में आ कर बसे। इस ग्रंथ के अनुसार अभी तक ऐसे कोई साक्षी नहीं हैं जो यह सिद्ध कर सके कि उक्त ग्रंथो के रचना काल को ईसा पूर्व छठी शताब्दी से  भी पूर्व का बता सके।  गोया कहना होगा कि रामायण और महाभारत दोनों महाकाव्यों की रचना ईसा पूर्व छठी शताब्दी ही है। यहां तक कि वेदमंत्रों के क्रमबद्ध करने का काल भी वही है और इसी काल में ही आर्य लोग गंगा के  तराई वाले क्षेत्रों में फैल रह थे। इस लेख को लिखने का म$कसद भी यही है कि हमें अच्छे ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए ताकि हम भ्रांतियों और अतिशियोक्तियों से बच सके। कहना उचित होगा कि अगर हम देश सच में ही सुशासन चाहिए तो सबसे पहले मतदाताओं को लोभ में आकर मतदान छोडऩा होगा। वहीं लोकतंत्र क ो अगर हमारे नुमाइंदगी करने वाले राजनेता सच में ही लोकतंत्रिक व्यवस्था को बचाए रखना चाहते है तो उन्हें कामवासना से भी बचना होगा। वरना भ्रांतियां फैलाने और अतिशियोक्तियों युक्त प्रचार करने चलन ज्य़ादा लम्बा नहीं चलने वाला।

 

 

 

लोकतंत्रिक व्यवस्था में राजनेताओं को कामवासना से बचना होगा