नवरात्रि का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?
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नवरात्रि का आध्यात्मिक रहस्य क्या है?
(Kiran Kathuria) www.bharatdarshannews.com Wednesday,25 September , 2019)

Faridabad News, 25 September 2019 : प्राचीन पौराणिक कथा है की राक्षसों  से देवता जब काफी त्रस्त हो गए तो उन्होंने अपनी रक्षा  के लिए शक्ति की आराधना करने लगे। फलस्वरूप शक्ति ने दुर्गा रूप में प्रकट होकर राक्षसों का विध्वंस किया और देवताओं के देवत्व की रक्षा की। देवताओं को सुरक्षित रखने के लिए यह देवी असुरों से सदैव संग्राम करती रहती थी। अत: इस देव-असुर संग्राम का रूप देकर एक पूजा का रिवाज चलाया गया। तब से अनेक देवियो की पूजा का प्रचलन हिन्दू धर्म में प्रचलित हुआ। आज भी हिन्दू समाज में शक्ति के नौ दिनों तक पूजा चलती है जिसे नौ दुर्गा या नवरात्रि कहते है।

तो आइये, नवरात्रि के नौ देवियो पर एक नजर डाले-

नवरात्र  का पहला दिन : दुर्गा देवी के रूप में माना जाता है वह सैलपुत्री के नाम से पूजी जाती है। बताया जाता है कि यह पर्वत राज हिमालय कि पुत्री थी। इसलिए पर्वत कि पुत्री पार्वती या सैलपुत्री के नाम से शंकर कि पत्नी बनी। दुर्गा को शिव -शक्ति कहा जाता है। हाथ में माला भी दिखाते है ।माला परमात्मा के याद का प्रतीक है । जब परमात्मा को याद करेंगे तो जीवन में सामना करने कि शक्ति, निर्णय करने सहन करने, सहयोग करने इत्यादि अष्ट शक्तिया प्राप्त होती है। इसलिए दुर्गा को अष्ट भुजा दिखाते है।

नवरात्र का दूसरा दिन : देवी ब्रह्मचारिणी का है, जिसका अर्थ है-तप का आचरण करने वाली। तप का आधार पवित्रता होता  है, जिसके लिए जीवन में ब्रह्मचर्य कि धारणा आवश्यक है। इस देवी के दाहिने हाथ में जप करने कि माला और बाये हाथ में कमण्ड़ल दिखाया जाता है।

 नवरात्र के तीसरे दिन : देवी-चंद्रघण्टा के रूप में पूजा कि जाती है। पुराणों कि मान्यता है कि असुरो के प्रभाव से देवता काफी दीन-हीन तथा दु:खी हो गए, तब देवी कि आराधना करने लगे। फलस्वरूप देवी चंद्रघण्टा प्रकट होकर असुरों का संहार करके देवताओं को संकट से मुक्त किया। इस देवी के मस्तक पर घंटे के आकर का अद्र्धचंद्र, 10 हाथों में खड्ग, शस्त्र, बाण इत्यादि धारण किये दिखाए जाते है। चंद्रघण्टा देवी कि सवारी शक्ति का प्रतीक सिंह है जिसका अर्थ है-शक्तिया अष्ट शक्तियों के आधार से शासन करती है ।

नवरात्र के चौथे दिन :  देवी पुष्पाण्डा  के रूप में पूजा की जाती है। बताया जाता है की यह खून पीने वाली देवी है। काली पुराण में देवी की पूजा में पशु बलि का विधान है। ऐसी मान्यता के आधार पर देवियों के स्थान पर बलि प्रथा है आज भी प्रचलित है। वास्तव में, हमारे अंदर जो भी विकारी स्वभाव और संस्कार हंै उस पर विकराल रूप धारण करके अर्थात ढृढ़ प्रतिज्ञा करके मुक्ति पाना है  ।

नवरात्र के पाँचवें दिन : देवी स्कन्द माता के रूप में पूजा की जाती है। कहते हैं कि यह ज्ञान देने वाली देवी है। इनकी पूजा करने से ही मनुष्य ज्ञानी बनता है। यह भी बताया गया है कि स्कन्द माता कि पूजा ब्रह्मा, विष्णु, शंकर समेत यक्ष, किन्नरों और दैत्यों ने भी कि है ।

नवरात्र के छठें दिन : देवी कात्यायनी के रूप में पूजा कि जाती है। कत एक प्रसिद्ध महर्षि बताये जाते है जिनके पुत्र कात्य ऋषि थे। इनके ही गोत्र से महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुआ। महिषासुर दानव का वध जिस देवी ने किया था, उस देवी का प्रथम पूजन महर्षि कात्यायन ने किया था और इस कारण ही वह देवी कात्यायनी कहलाई। इनका वाहन सिंह दिखाया जाता है ।

नवरात्र के सातवें दिन : देवी कालरात्रि के रूप में पूजा की जाती है। इनकी शरीर का रंग काला और सिर के बाल रौद्र रूप में बिखरे हुए दिखाये जाते है। इनका वाहन गधे को दिखाया गया है। जिसका अर्थ है कि कलियुग में एक सामान्य गृहस्थ कि हालत प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझते हुए गधे जैसी हो जाती है और जब वह गधा अपने मन-बुद्धि में कालरात्रि जैसी देवी को बैठा लेता है तो देवी उस गृहस्थ को परिस्थितियों से पार निकाल ले जाती है ।

नवरात्र के आठवें दिन :  देवी महागौरी के रूप में पूजा कि जाती है। कहते हैं कि कन्या रूप में यह बिल्कुल काली थी। शंकर से शादी करने हेतु अपने हेतु गौरवर्ण के लिए ब्रह्मा कि पूजा कि, तब ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर उसे काली से गौरी बना दिया । इनका वाहन वृषभ बैल दिखाया जाता है जो कि धर्म का प्रतिक है ।

नवरात्र के नौवें दिन :  देवी सिद्धिदायी के रूप में पूजा कि जाती है। कहा गया है कि यह सिद्धिदायी वह शक्ति है जो विश्व का कल्याण करती है। जगत का कष्ट दूर कर अपने भक्तजनो को मोक्ष प्रदान करती है। नवरात्री महोत्स्व में प्रथम दिन से ही श्रद्धालु एक थाली में काली मिट्टी डालकर उसमे सात प्रकार के अनाजों का बीजा रोपण करते  है। उस पर पानी से भरा मिट्टी का घड़ा स्थापित करके नौ दिन रोज एक-एक फूलों की माला चढ़ाई जाती है। इन्ही दिनों में शिवशक्तियों का गायन पूजन होता है। दसवें दिन फिर इसी कलश को पानी में प्रवाहित कर रावण के दहन का समारोह और राजा राम का रा’यतिलक समारोह विजयदशमी के नाम से मनाया जाता है ।

 यह सारी रीती रस्मों का आध्यात्मिक महत्व क्या है ? इसका विचार करना आवश्यक है।

पानी से भरा मिट्टी का घड़ा : सत्य ज्ञानरूपी जल से परिपूर्ण दिव्य बुद्धि रूपी घड़ा।

सात प्रकार के अनाज बोना: सात्विक विचारों को सतो दैवी गुणों की धारणा करना ।

घड़े को नौ दिन फूलो की माला चढ़ाना :बुद्धि रूपी कलश में सदैव प्रसन्नता के लिए मन को ईश्वरीय चिंतन में रखना।

नौ दिन व्रत रखना: सदैव ईश्वर का नित्य स्मरण करना।

नवरात्री के अंत में यज्ञ हवन करना: बुरे संकल्पों और विकारों का विनाश करने का प्रतिक।

शिवकन्याओ के माथे पर कलश: शिव परमात्मा द्वारा दिए हुए ज्ञान को बुद्धि रूपी कलश में धारण क्र सम्पूर्ण विश्व को ज्ञानामृत दान देने का प्रतिक।

शक्तियों का वाहन हिंसक पशु : काम, क्रोध आदि विकार रूपी हिंसक वृतियों पर विजय प्राप्त कर उन्हें वश में करने का प्रतिक।

दशहरे को साधनों की पूजा: कर्म करते हुए जो भी साधनों द्वारा जीवन सुखी करते है,उनके प्रति आदर भाव व्यक्त करने।

दशहरे के दिन रावण दहन : रावण अर्थात रुलाने वाला, दु:ख देनेवाला। दशानन 5 विकार स्त्री, 5 विकार पुरुष के, ऐसे विकारों का हनन करना। इस तरह नौ देवियों की आध्यात्मिक रहस्यों को धारण करना ही नवरात्रि पर्व मनाना है।

वर्तमान समय स्वयं निराकार परमपिता परमात्मा इस कलियुग के घोर अंधकार में माताओ-कन्याओ द्वारा सभी को ज्ञान देकर फिर से स्वर्ग की स्थापना कर रहे है । परमात्मा द्वारा दिए गए इस ज्ञान को धारण कर अब हम ऐसी नवरात्रि मनायें जो अपने अंदर रावण अर्थात विकार है ,वह ख़त्म हो जाये। यही है स‘चा-स‘चा दशहरा मनाना। ऐसा  दशहरा मनायें, तब ही दिवाली अर्थात भविष्य में आने वाली सतयुगी दुनिया के सुखों का अनुभव कर सकेंगे। इसलिए है आत्माओं। अब जागो, केवल नवरात्रि का जागरण ही नहीं करो बल्कि इस अज्ञान नींद से भी जागो ।यही स‘ची -स‘ची नवरात्रि मनाना और जागरण करना है ।ऐसी नवरात्रि की आप सभी को मुबारक हो, मुबारक हो।

-बीके पूनम, राजयोग मेडिटेशन टीचर ब्रह्मकुमारीज विश्व आध्यात्मिक विश्वविद्यालय।

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