जुम्हरी पहचान और खि़दमत के बगैर क्या कोई नुमाइंदा जीतेगा?
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जुम्हरी पहचान और खि़दमत के बगैर क्या कोई नुमाइंदा जीतेगा?
(Kiran Kathuria) www.bharatdarshannews.com Tuesday,24 September , 2019)

JB Sharma/Bharat Darshan News, 24 September 2019 : हरियाणा में सन् 2019 में होने वाले विधान सभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। ऐसे में विभिन्न राजनीतिक दलों में चुनावी सरगर्मियों का तेज़ होना स्वाभाविक है। यहां तक कि अलग-अलग राजनितिक दलों में चुनाव लडऩे के इच्छुक नए -पुराने लोग अपनी-अपनी संबंधित पार्टियों के सिपहासलारों के हुजूर में जाकर सलाम ठोकने लगे हैं और उनके सामने अपने तजरुबे-तालीम और अपने आकाओं के  सामने-लोगों के बीच अपनी पहचान व शान का ब्याख्यान भी पूर ज़ोर तरीके से करने में जुट गए हैं। यह भी सच है कि भारत देश में जुम्हूरियत के चलते अब तक किसी भी स्तर के चुनावों को नुमाइंदों ने अपनी जुम्हरी पहचान के बगैर नहीं लड़ा। मिलजुमला बात यह है कि अगर किसी ने लोगो की नुमाइंदगी करनी तो उसे जहां एक ओर उसे  देश व समाज की सेवा करनी होगी । वहीं दूसरी और सामयिक विषयों पर पकड़ बना कर लोगों के बीच अपनी पहचान  भी पुख्ता करनी पड़ेगी।  लेकिन, बदनसीबी यह है कि वर्तमान में भौतिकवाद और बाज़ारवाद के दौर में जन-प्रतिनिधित्व करने वाले बहुत से लोगो ने राजनीति को पेशा मानना आरंभ कर दिया जिसके परिणाम हम सब के सामने है। क्योंकि आज एक नुमाइंदे की पहली पहचान उसकी काबलीयत या लिया$कत नहीं बल्कि उसकी सरमायेदारी कहें ज़रदारी रह गई है। यह कथन हम ने दम तोड़ते लोकतंत्र को देखते हुए लिखा है।

  यह बात अलग से  चिंतन की है कि लोग हमारे उक्त कथन से सहमत होंगे या नहीं? जबकि बात गलत नहीं कही जा रही। खामोशी से सब कु छ सहन करने की आदत उन देशों के नागरिकों में अधिक पाई जाती जो देश लंबे समय तक गुलाम रहते हैं। बेशक अपना देश उन लंबे समय तक गुलाम रहने वाले देश में से ही एक है। जिसने लगभग हज़ार साल के दासत्व को झेला है। हम बात कर रहे हैं मौजूदा समय में राजनीति में प्रवेश करने वाले नए पदार्पण करने वालों और पुराने खिलाडिय़ों की। राजनैतिक दलों द्वारा टिकटों के आवंटन का दौर समझो आरंभ हो चुका है। समझने वाली बात यह है कि जिसको देखो वही आम जन-मानस की समस्याओं और उनकी गरीबी दूर करने और मंहगाई आदी कम करने की दुहाई देकर बस एक जीताने की बात करते हैं। यह बात अलग है कि जीता हुआ उमीदवार जीत के बाद बीजली-पानी की समस्या को दूर करवाने की फरीयाद लेकर आए जन-साधरण को उनके दरवाजे से बेइज्ज़त होकर यहा तक पुलिस की नराज़गी का भी सामना करने पड़े। ऐसे अनेक वाक्यता आप ने देखे-सुने होंगे।

    कहना गलत न होगा कि मतदाता की बेबसी यह कि वह छोटे-छोटे लोभ में फंसकर अपनी बचीखुची समझदारी को भी नुमाइंदो के  आगे गिरवी रख बैठता है। इसी बात का लाभ ये बाज़ारवादी-भौतिकवादी बहुत से कथित नेता उठा जाते हैं।

जुम्हरी पहचान और खि़दमत के बगैर क्या कोई नुमाइंदा जीतेगा?