" बड़े हस्पतालों के किस्से "
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EDITORIAL

" बड़े हस्पतालों के किस्से "
(Kiran Kathuria) www.bharatdarshannews.com Friday,17 August , 2018)

Bharat Darshan News, 17 August 2018 : मेदांता जैसे प्रतिष्ठित  हस्पताल की पिछले एक लेख में मैंने चर्चा की थी| डॉक्टरों की लापरवाही के कारण पेशेंट जब मौत के मुँह में जाने लगा तब जाकर प्रमुख डॉक्टर ने कहा कि मै तो काठमांडूं घूमने जा रहा हूँ| और अब मेरा असिस्टेंट इस केस की देखभाल करेगा।ज़रा सोचिये, लिवर ट्रान्सप्लाण्ट बिगड़ जाने   के बाद डॉक्टर काठमाण्डू घूमने जाएगा क्या?  अब इसके बाद वो डॉक्टर काठमांडूं गया या नहीं गया ये किसी को भी मालूम नहीं क्यूंकि इन डॉक्टर्स का आने जाने का रास्ता पीछे से है और पेशेंट के सामने से ये लोग नहीं आते जाते| कुछ और भी रोगियों ने मेरे से अपनी दास्तान का जिक्र किया| जब पेशेंट नया होता है तो सीनियर डॉक्टर उसके केस को खुद अपने आप हाथ में लेकर देखता है| और अच्छे से तसल्ली से उसके पड़ताल करता है| उसको और उसके रिश्तेदारों को जब तक उस डॉक्टर पर भरोसा नहीं हो जाता जब तक सीनियर डॉक्टर खुद से पर्सनल टच देकर सारी देखभाल करते हैं लेकिन जैसे ही फीस सारी जमा हुई और ऑपरेशन हो गया उसके पश्चात सीनियर डॉक्टर पेशेंट से या उसके रिश्तेदारों से मिलना भी गवारा नहीं करते| इंसानियत के नाते, प्रोफ़ेशनलिज़्म के नाते ये बहुत ही नागवार चीज की श्रेणी में आयेगा| ऐसा मै मानता हूँ|  जो मेरे देखने में और व्यक्तिगत तजुर्बे में आया| सवेरे 6  बजे से डॉक्टर ऑपरेशन करने लगते है और देर रात तक ओपरेशनो की लाइन लगी रहती है और उसके कारण से डॉक्टर हाई स्ट्रेस में ऑपरेट करते है| मुझे ऐसा खुद से भुगते हुए रोगियों ने बताया| ICU  के अंदर पेशेंट के मुँह पर ऑक्सीजन लगी रहती है नाक बंद रहती है लेकिन उसके कान खुले रहते है वो सारी चीज सुनता है समझता है बस केवल वो बोल नहीं पाता| अगर तो ठीक होकर के घर चला गया तो डॉक्टरों के वार्तालाप को ignore करने में ही अपनी भलाई समझता है, और अगर ठीक नहीं हुआ तो उसका मुँह हमेशा के लिए बंद हो ही जायेगा| तो वो किसी से भी अपने दर्द बयान नहीं कर सकता| कुछ इस कारण से भी बोल नहीं सकता की डॉक्टर नाराज हो गया तो मेरा केस कहीं और ना बिगाड दे| और जो ठीक नहीं हो पाए और राम जी की शरण में चले गए है वो किसको अपना दर्द ब्यान करेंगे| डेंगू जैसे बुखार में मरीजों के 20 लाख रुपये तक खर्च हो गये और उसके बाद भी पेशेंट की मृत्यु हो जाना भी ऐसा भी सुनने में आया है| रीढ़ की हड्डी का ऑपरेशन बिगड़ जाना और मरीज ता उम्र के लिये अपाहिज हो गया| ये भी हाईपर टैंशन वाले डॉक्टरों के ही हाथों होता है|

स्ट्रेस में यदि काम करेगा तो गलतियां भी करेगा और उस के कारण से जो गलतियां होंगी उसका बोझ उसके परिवार पर पड़ेगा और आस पास के लोगो पर भी उसका प्रभाव पड़ेगा| उसका कोई निश्चित कोड ऑफ़ कंडक्ट होना चाहिए उससे अधिक डॉक्टर्स को काम करने की परमिशन नहीं होनी चाहिए| और सबसे बड़ी बात मैं देखता हूँ कि  हाई स्ट्रेस में ऑपरेशन करने वाला डॉक्टर अच्छा ऑपरेशन कैसे कर सकता है| 8 - 10  ऑपरेशन एक दिन में करने वाला डॉक्टर अपना काम सही तरीके से करेगा, इसकी अपेक्षा हम नहीं रख सकते| और वो कहीं न कहीं गलतियां जरूर करेगा| जैसे मुझे एक भुक्त भोगी ने बताया कि कैसे ICU के अंदर सीनियर डॉक्टर्स आपस मे कुत्ते बिल्लियों की तरह लड़ते हुए पाए गए| पेशेंट तो बोल सकने की स्थिति मैं नहीं था लेकिन वो सुन तो रहा था और ठीक होने के बाद उसने घर  आकर के जिक्र भी किया लोगो से कि भाई ऐसे ऐसे ICU में मैंने अपने कानों से सुना है|  डॉक्टर कहने  लगा मै क्या जवाब दूँ गलती हो गयी तो हो गयी तो वो बोले तुम जानो तुम्हारा काम जाने| अब इस प्रकार की बात चीत अगर डॉक्टरों के बीच में हो रही है तो उसका पेशेंट के ऊपर कैसा गलत प्रभाव पड़ेगा| दोनों डॉक्टर के   बीच  सिर्फ मार पिटाई की कसर रह गयी थी बाकी तो जो भी गाली गलौच होना था वो हो चुका था| मैंने पहले कभी सुना था पुलिस थाने में जिन सिपाहियों और अफसरों की ड्यूटी रहती है वो 18 - 20  घंटे बिना सोये काम करते है और हफ्ते में कोई उनको छुट्टी नहीं मिलती| इसी प्रकार से फौज के सिपाही  जो मोर्चों  पर तैनात रहते हैं उनको छुट्टी नहीं मिलती और इसका एक बड़ा नेगटिव एफेक्ट उनकी सेहत पर होता है| कभी कभी तो देखा जाता है कि सिपाही ने खुद को गोली मार कर आत्म हत्या कर ली या जरा सी कोई छोटी बात हुई और अपने साथियो से नाराज हुआ और उसने अपने साथियों को गोली से उड़ा दिया| ये बेहद गम्भीर मसला है| हम एयरलाइन के फील्ड में भी देखते है पायलट और केबिन क्रू से ज्यादा काम नहीं लिया जाता| उसका एक कोड ऑफ़ कंडक्ट और एक वर्किंग मैन्युअल होता है उसके हिसाब से काम लिया जाता है| और शायद हमारे देश में आर्मी या डॉक्टर्स के लिए ऐसा कोड ऑफ़ कंडक्ट नहीं बना कि उन लोगो को एक तय मर्यादा के अंदर काम करने का अभ्यास पड़े| उनके वर्किंग hours  तय हों बहरहाल वह भी तो इंसान ही है मैं ये सब बात चीत का, आपसे जिक्र इसलिए कर रहा हूँ की समाज में इस विषय में इस विषय में जागरूकता आये और डॉक्टर लोग और सरकार के लोग चिंतन मनन इस विषय पर करे कि यदि हम इस बढ़ते हुए भेड़चाल को रोकेंगे नहीं तो इसका बहुत बुरा प्रभाव चिकित्सा जैसे  काम की गुणवत्ता पर पड़ेगा| मेरा तो प्रदेश सरकार से भी ये निवेदन है कि ऑडिट के माप दंड इन हॉस्पिटल्स के लिए जरूर रखें| एक साल में एक सीनियर डॉक्टर ने कितने ऑपरेशन किये और उसको एवरेज आउट न करें बल्कि एक दिन में कितने ऑपरेशन कर रहे है| और जब उस दिन का कोटा पूरा हो जाए तो डॉक्टर की छुट्टी कर दी जाए| और यदि समय सीमा को cross भी करते है तो उसका भी एक मार्जिन तय हो| यानी एक समय सीमा में कितने ऑपरेशन कर सकता है और अगर वो इस समय सीमा का भी उलंघन करता है तो उस डॉक्टर के ऊपर कार्यवाही होनी चाहिए| क्यूंकि वो जो अधिक ऑपरेशन कर रहा है वो पेसेंट की गरज के लिए नहीं कर रहा है बल्कि वो अपने लालच के लिए कर रहा है और इसको पेसेंट की गरज बताकर के ढोंग रचा जाता है इसलिए इस पर रोक लगनी चाहिए और इसपर ऑडिट होनी चाहिए और जो भी इसकी अवहेलना  करेगा उस हस्पताल पर जुर्माना भी लगना चाहिए और उन रिपोर्ट्स का डेटा ये हॉस्पिटल्स अपने website के ऊपर अपलोड करे ताकि पब्लिक डोमेन और पब्लिक की नजरो में ये सारा डेटा आये| फिर जिस किसी की इच्छा हो वो अपना  निर्णय इसके आधार पर स्वयं करे| कुछ लोग स्वास्थ्य सेवाओं को हेल्थ केयर इंडस्ट्री में गिनने लगे हैं। जब ये इंडस्ट्री है तो ओवर टाइम आदि में इंडस्ट्री के माप दंड तो लगेंगे ही। किसी को एतराज़ नहीं होना चाहिए। एक और बात, जब इन हस्पतालों को जमीन रियायती दरों पर सरकार से मिलती हैं तो इनकी रेट लिस्ट भी तय होनी चाहिये| सरकार एक Medical Regulatory Authority का गठन शीघ्रता से करें|   

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