विपक्ष एकजुट रहा तो 2019 में नहीं जीत पाएंगे नरेंद्र मोदी
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विपक्ष एकजुट रहा तो 2019 में नहीं जीत पाएंगे नरेंद्र मोदी
(Kiran Kathuria) www.bharatdarshannews.com Sunday,03 June , 2018)

New Delhi News, 3 June 2018 : उत्तर प्रदेश के कैराना लोकसभा चुनाव में संयुक्त विपक्ष की ओर से राष्ट्रीय लोकदल की उम्मीदवार तब्बसुम हसन बेगम की जीत से जीत के बाद यह तय हो गया है कि 2019 में भाजपा की राह में कांटे ही कांटे हैं और उसका पुनः सत्ता में आना नामुमकिन है। भाजपा कैराना लोकसभा सीट पर ही नहीं हारी बल्कि उत्तर प्रदेश की ही नूरपुर विधानसभा सीट पर सपा, बिहार की जोकीहाट सीट से लालू की पार्टी राजद के उम्मीदवार की जीत, पश्चिम बंगाल की महेशतल्ला विधानसभा सीट पर टीएमसी उम्मीदवार की जीत, केरल विधानसभा की चेंगन्नूर सीट पर सीपीएम की जीत, झारखंड की दो विधानसभा सीटों सिल्ली और गोनिया में झामुमो की जीत, महाराष्ट्र की भंडारा−गोंदिया लोकसभा सीट पर शरद पवार की पार्टी एनसीपी उम्मीदवार की जीत, पंजाब की विधानसभा सीट शाहकोट, महाराष्ट्र के पुलिस कड़ेगांव विधानसभा सीट, मेघालय की अंपाती विधानसभा सीट, कर्नाटक की आर.आर. नगर विधानसभा सीट पर कांग्रेस उम्मीदवारों की जीत से साफ हो गया है कि भाजपा के खिलाफ वोटरों में जबर्दस्त नाराजगी है गत मार्च माह हुए लोकसभा उपचुनावों में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने रणनीति के तहत बसपा प्रमुख मायावती के समर्थन से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे से खाली हुई लोकसभा सीटों गोरखपुर और फूलपुर में बाजी मारी थी और भाजपा की सीटों पर कब्जा किया था और उनका यह फार्मूला कैराना में भी बखूबी चला है और भाजपा में इससे खलबली है। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है जिसमें लोकसभा की 80 सीटें हैं जिनमें से 2014 में भाजपा को 72 सीटें मिली थीं और वह सरकार बनाने में कामयाब हुई थी लेकिन अब चुनौती बढ़ गई है और 2019 में भाजपा के औंधे मुंह गिरने का अनुमान व्यक्त किया जा रहा है। इसका बड़ा कारण यह है कि उत्तर प्रदेश की पूरी सरकार सहित कई केन्द्रीय मंत्री उत्तर प्रदेश के कैराना में डेरा डाले हुए थे लेकिन परिणाम भाजपा के खिलाफ है। भाजपा कैराना ही नहीं हारी बल्कि उत्तर प्रदेश के नूरपुर सीट भी समाजवादी पार्टी ने झटक ली है। कैराना उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 630 कि.मी. की दूरी पर स्थित है और इसमें 5 विधानसभा क्षेत्र हैं। इसमें कुल मिलाकर लगभग 17 लाख मतदाता हैं जिनमें मुस्लिम, जाट और दलित वोटरों की संख्या काफी उल्लेखनीय है। यह सीट भाजपा सांसद हुकुम सिंह के निधन के कारण खाली हुई थी और अब उनकी बेटी मृगांका सिंह भाजपा उम्मीदवार के रूप में उपचुनाव में उतरी थीं। राष्ट्रीय लोकदल की ओर से तमाम विपक्ष की साझा उम्मीदवार तब्बसुम हसन की जीत से भाजपा की चिंता बढ़ गई है। भाजपा इस सीट को हर हालत में बचाए रखने के प्रयास कर रही थी और अंतिम दिनों में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्य नाथ ने वोटों के ध्रुवीकरण की पूरी कोशिश की थी लेकिन अंततः भाजपा को यहाँ से मात मिली है। कैराना 2016 में तब चर्चा में आया था जब यहां के तत्कालीन भाजपा सांसद हुकुम सिंह चौधरी ने हिंदुओं के पलायन का आरोप लगाया था। हालांकि तबस्सुम हसन का कहना है कि यहां हिंदू और मुस्लिम अमन−चैन से रहते हैं और भाजपा यहां साम्प्रदायिक तनाव पैदा करके वोटों की फसल काटने के मकसद से हमेशा आरोप लगाती रहती है। भाजपा महाराष्ट्र की पालघर सीट बचाने में कामयाब हुई है। भाजपा ने इस सीट से कांग्रेस छोड़कर आए राजेंद्र गावित को मैदान में उतारा था और यहां दलित समुदाय की बहुजन समाज अघाड़ी पार्टी ने इस जीत में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। दूसरे इस सीट के करीब 20 हजार वोटरों ने चुनावों की बहिष्कार किया है। इस सीट से शिवसेना ने दिवंगत भाजपा सांसद चिंतामन वानगा के बेटे श्रीनिवास वानगा को खड़ा किया था और शिव सेना ने सरकार में साथ रहते हुए भी भाजपा को टक्कर दी है। चौथे लोकसभा उपचुनाव नागालैंड में भाजपा समर्थित उम्मीदवार जीत गये। यह सीट नैशनल डैमोक्रेटिक प्रोग्रैसिव पार्टी (एन.डी.पी.पी.) के नेता नाइफ्यू रायो के इस्तीफे के कारण फरवरी में खाली हुई थी क्योंकि वह अब मुख्यमंत्री बन गए हैं। यह उपचुनाव नागा पीपल्स फ्रंट (एन.पी.एफ.) तथा सत्तारूढ़ गठबंधन पी.डी.ए. के उम्मीदवारों के बीच शक्ति परीक्षण था। पी.डी.ए. में एन.डी.पी.पी. और भाजपा मुख्य घटक हैं। भारतीय जनता पार्टी 10 राज्यों- उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, महाराष्ट्र, बिहार, गुजरात, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अपना पिछला चुनाव परिणाम दोहराने की स्थिति में नहीं है। भाजपा को साल 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल 282 सीटें मिली थीं, जिसमें से 220 इन्हीं 10 राज्यों के हिस्से की हैं। अब नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं और अब तो भाजपा के सहयोगी दल भी खुलकर भाजपा की खिलाफ बात कर रहे हैं और भाजपा के ही दलित सांसद खुद अपनी ही सरकार के खिलाफ हल्ला बोल रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सहयोगी पार्टी अपना दल में बिखराव हो चुका है और बिहार में उपेन्द्र कुशवाह की पार्टी भी भाजपा से अलग लड़ने का दम भर रही है और आन्ध्र प्रदेश में चन्द्रबाबू नायडू अलग हो चुके हैं। शिवसेना भी खुलकर भाजपा के खिलाफ है और 2019 के चुनावों में वह महाराष्ट्र में भाजपा को टक्कर देगी। उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र दूसरा बड़ा राज्य है। यहां 48 सीटें हैं जिसमें से 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 23 और सहयोगी पार्टी शिवसेना को 18 सीटें मिली थीं। बिहार में भाजपा को कड़ी मेहनत करनी होगी। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 40 में से 22 सीटें मिली थीं और सहयोगी दलों को 9 सीटें मिली थीं। बिहार में हुए उपचुनावों में लालू की पार्टी लगातार जीती है जबकि वह विपक्ष में है इसलिए राजद अपेक्षाकृत ज्यादा सीटें जीतने की स्थिति में होगा और भाजपा को यहां कड़ा मुकाबला करना पड़ेगा और पिछला परिणाम दोहराना असंभव होगा। बिहार में लालू प्रसाद यादव का मुस्लिम यादव समीकरण काम कर रहा है और दलित भी उनकी पार्टी से जुड़ रहे हैं और पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी लालू के साथ आ गये हैं और कहा जा रहा है कि उपेन्द्र कुशवाहा और रामविलास पासवान भी चुनावों के समय पलट सकते हैं जो भाजपा के लिए झटका होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को अपने गृहराज्य गुजरात में भी परेशानी उठानी पड़ेगी और 2019 के चुनावों में निश्चित रूप से उसकी सीटें घटेंगी। भाजपा को गुजरात विधानसभा चुनावों में खूब मशक्कत करनी पड़ी थी तब जाकर वह अपनी सरकार बचाने में कामयाब हो पाये थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को राज्य की सभी 26 सीटें मिली थीं लेकिन कुछ इलाकों में भाजपा के खिलाफ जनता एकजुट हुई है और विशेषकर दलितों में भाजपा का जनाधार घटा है। आंध्र प्रदेश की 25 लोकसभा सीटों में से भाजपा को सिर्फ 2 सीटें मिली थीं लेकिन उसकी सहयोगी तेलगु देश पार्टी ने 15 सीटें जीती थीं और ऐसे में उसे आंध्र से कुल 17 सीटों का बहुमत हासिल था। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी भाजपा खराब हालत में है और हाल ही में सम्पन्न हुए उपचुनावों में भाजपा दोनों जगह हारी है। पंजाब में कांग्रेस मजबूत स्थिति में है और केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का दबदबा अब खत्म हो चुका है और इसका फायदा कांग्रेस को ही होगा। हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सरकारें हैं लेकिन दोनों ही सरकारें प्रशासनिक मोर्चे पर विफल साबित हो रही हैं जिसका कांग्रेस को फायदा होगा।

 

-विजय शर्मा

 

विपक्ष एकजुट रहा तो 2019 में नहीं जीत पाएंगे नरेंद्र मोदी